Tuesday, 8 May 2018
Monday, 7 May 2018
किनकाकू जी बौद्ध मठ ,क्योटो प्रीफेक्चर,जापान
यह किनकाकू जी बौद्ध मठ क्योटो प्रीफेक्चर जापान में मौजूद है। यह बौद्ध मठ तेरहवीं शताब्दी में बनाया गया था जिसे जापान के राजा के दरबार में काम करने वाले एक शक्तिशाली व्यक्ति साईओनजी किन्तसोने ने बनवाया था ,जिसे योशीमित्सु को बेचा गया और अंतिम उनकी इच्छाओं के मुताबिक इस जगह को मठ में बदला गया यह मठ कई बार जला और कई बार बनाया गया इसे 1955 में आखरी बार बनाया गया था इस स्थान को जापान सरकार ने राष्ट्रीय विशेष ऐतिहासिक स्थल और राष्ट्रीय विशेष लैंडस्केप के रूप में नामित किया गया है,
यह किनकाकू जी बौद्ध मठ क्योटो प्रीफेक्चर जापान में मौजूद है। यह बौद्ध मठ तेरहवीं शताब्दी में बनाया गया था जिसे जापान के राजा के दरबार में काम करने वाले एक शक्तिशाली व्यक्ति साईओनजी किन्तसोने ने बनवाया था ,जिसे योशीमित्सु को बेचा गया और अंतिम उनकी इच्छाओं के मुताबिक इस जगह को मठ में बदला गया यह मठ कई बार जला और कई बार बनाया गया इसे 1955 में आखरी बार बनाया गया था इस स्थान को जापान सरकार ने राष्ट्रीय विशेष ऐतिहासिक स्थल और राष्ट्रीय विशेष लैंडस्केप के रूप में नामित किया गया है,
Sunday, 10 December 2017
शिवनेरी बौद्ध गुफाएं , जुन्नर , महारष्ट्र
वैसे तो महाराष्ट्र का शिवनेरी किला इस लिए प्रसिद्द है की यह छत्रपति शिवजी राजे की जन्म स्थली है , वैसे यह किला शिवनेरी पुणे के नाणेघाट में है जो ट्रैकर के लिए एक स्वर्ग के सामान है ,शिवनेरी किले के समीप ही है जुन्नर नाम का एक प्रसिद्द और इतिहासिक शहर है ,यह शहर शंक साम्राज्य की राजधानी रहा जो केवल बुद्ध के 300 साल बाद हुआ इन के कई राजा बौद्ध धम्म को मानाने वाले थे ,इस के बाद शंक साम्राज्य सातवाहन राजा गौतमीपुत्र सातकर्णी ने हराया यह वही राजा है जिन्होंने आंध्र प्रदेश के प्रसिद्द बौद्ध केंद्र अमरावती को बसाया था , यह बौद्ध धम्म के बड़े संगरक्षक थे, जुन्नर शहर एक व्यापारिक मार्ग था यही कारण रहा की सातवाहन राजाओ ने इस जगह किले का निर्माण कराया , आज जिसे शिवनेरी किले के नाम से जाना जाता है , सातवाहन साम्राज्य के बाद यह चालुक्य, राष्ट्रकूट आदि साम्राज्यों के कब्जे में आता रहा , लेकीन जैसा मैंने बताया की सातवाहन राजा बौद्ध धम्म के संगरक्षक थे और यह जगह एक व्यापारिक मार्ग पर थी इस लिए इस जगह से बौद्ध भिक्षु धम्म प्रचार करते थे इस कारण यह कुछ बौद्ध गुफाये पायी गयी है यह 60 गुफाओं का समूह है जो सातवाहन काल का है दूसरी शताब्दी के शुरुआती दिनों में यह स्थान बौद्ध गतिविधियों के केंद्र का महत्वपूर्ण स्थान था इन बौद्ध गुफाओ में कुछ जो महत्वपूर्ण गुफाये है वह है
गुफा 26 - दो मंजिला बौद्ध विहार
गुफा 45 - "बारा-कोत्री" के नाम से जाना जाने वाला बौद्ध भिक्षुओं का निवास जो 12 अलग अलग भागो में है ।
गुफा 51 - एक चैत्य में किसी व्यापारी का शिलालेख
वैसे तो महाराष्ट्र का शिवनेरी किला इस लिए प्रसिद्द है की यह छत्रपति शिवजी राजे की जन्म स्थली है , वैसे यह किला शिवनेरी पुणे के नाणेघाट में है जो ट्रैकर के लिए एक स्वर्ग के सामान है ,शिवनेरी किले के समीप ही है जुन्नर नाम का एक प्रसिद्द और इतिहासिक शहर है ,यह शहर शंक साम्राज्य की राजधानी रहा जो केवल बुद्ध के 300 साल बाद हुआ इन के कई राजा बौद्ध धम्म को मानाने वाले थे ,इस के बाद शंक साम्राज्य सातवाहन राजा गौतमीपुत्र सातकर्णी ने हराया यह वही राजा है जिन्होंने आंध्र प्रदेश के प्रसिद्द बौद्ध केंद्र अमरावती को बसाया था , यह बौद्ध धम्म के बड़े संगरक्षक थे, जुन्नर शहर एक व्यापारिक मार्ग था यही कारण रहा की सातवाहन राजाओ ने इस जगह किले का निर्माण कराया , आज जिसे शिवनेरी किले के नाम से जाना जाता है , सातवाहन साम्राज्य के बाद यह चालुक्य, राष्ट्रकूट आदि साम्राज्यों के कब्जे में आता रहा , लेकीन जैसा मैंने बताया की सातवाहन राजा बौद्ध धम्म के संगरक्षक थे और यह जगह एक व्यापारिक मार्ग पर थी इस लिए इस जगह से बौद्ध भिक्षु धम्म प्रचार करते थे इस कारण यह कुछ बौद्ध गुफाये पायी गयी है यह 60 गुफाओं का समूह है जो सातवाहन काल का है दूसरी शताब्दी के शुरुआती दिनों में यह स्थान बौद्ध गतिविधियों के केंद्र का महत्वपूर्ण स्थान था इन बौद्ध गुफाओ में कुछ जो महत्वपूर्ण गुफाये है वह है
गुफा 26 - दो मंजिला बौद्ध विहार
गुफा 45 - "बारा-कोत्री" के नाम से जाना जाने वाला बौद्ध भिक्षुओं का निवास जो 12 अलग अलग भागो में है ।
गुफा 51 - एक चैत्य में किसी व्यापारी का शिलालेख
Sunday, 19 November 2017
अटक बौद्ध स्तूप , पंजाब ,पाकिस्तान
यह बात किसी से छुपी हुई नहीं है की पाकिस्तान में धार्मिक कट्टरता किस कदर हावी है। यहां धर्म विशेष के धार्मिक स्थलों छोड़ के किस और धर्म के लोगो को काफिर कहा जाता है और उन को बुतपरस्त कहा जाता है इस लिए पाकिस्तान की सरकार जानबूझ कर दूसरे धर्मो के धार्मिक स्थलों या ऐतिहासिक महत्व स्थलों को बर्बाद होने छोड़ देती है।
ऐसी ही एक बौद्ध महत्त्व का स्थल आज पाकिस्तान में अपनी आखरी सांस गिन रही है ग्रैंड ट्रंक रोड के किनारे पाकिस्तान के हिस्से वाले पंजाब में पुंजासाहेब नाम की एक जगह है सर जॉन मार्शल, जो भारत के महानिदेशक पुरातत्व सर्वेक्षण (1 9 02-19 28) थे, उन्होंने कहा था की इस जगह बौद्धों ने चार स्तूप और मठों को बनाया था जो तकशिला के बाद पाकिस्तान वाले हिस्से में सबसे बड़े बौद्ध मठो में से एक था यह बौद्ध करीब 2,000 साल पुराना था मतलब इस्लाम के जन्म से भी 600 साल पुराना इस के बाद इसे इस्लामी आक्रमणकारी ने तबाह कर दिया और जब यह इलाका सिखों के कब्ज़े में आया तब इस पे एक गुरुद्वारा बनाया गया लेकीन आज यह इलाका पूरी तरह तबाह है और इसे लोगो द्वारा कबज़ा कर घर और खेती के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है।
यह बात किसी से छुपी हुई नहीं है की पाकिस्तान में धार्मिक कट्टरता किस कदर हावी है। यहां धर्म विशेष के धार्मिक स्थलों छोड़ के किस और धर्म के लोगो को काफिर कहा जाता है और उन को बुतपरस्त कहा जाता है इस लिए पाकिस्तान की सरकार जानबूझ कर दूसरे धर्मो के धार्मिक स्थलों या ऐतिहासिक महत्व स्थलों को बर्बाद होने छोड़ देती है।
ऐसी ही एक बौद्ध महत्त्व का स्थल आज पाकिस्तान में अपनी आखरी सांस गिन रही है ग्रैंड ट्रंक रोड के किनारे पाकिस्तान के हिस्से वाले पंजाब में पुंजासाहेब नाम की एक जगह है सर जॉन मार्शल, जो भारत के महानिदेशक पुरातत्व सर्वेक्षण (1 9 02-19 28) थे, उन्होंने कहा था की इस जगह बौद्धों ने चार स्तूप और मठों को बनाया था जो तकशिला के बाद पाकिस्तान वाले हिस्से में सबसे बड़े बौद्ध मठो में से एक था यह बौद्ध करीब 2,000 साल पुराना था मतलब इस्लाम के जन्म से भी 600 साल पुराना इस के बाद इसे इस्लामी आक्रमणकारी ने तबाह कर दिया और जब यह इलाका सिखों के कब्ज़े में आया तब इस पे एक गुरुद्वारा बनाया गया लेकीन आज यह इलाका पूरी तरह तबाह है और इसे लोगो द्वारा कबज़ा कर घर और खेती के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है।
Saturday, 18 November 2017
मनसर बौद्ध कालीन स्तूप , नागपुर, महारष्ट्र
नागपुर शहर से कुछ दूर मनसर टेकडी एक पर हुए उत्खनन में बड़े प्रमाण में बौद्धकालीन अवशेष मिले थे. अब तक लगभग 2 हजार 766 बुद्धकालीन मुर्तियां उत्खनन में मिली थीं. खास बात यह है कि इसमें बड़े पत्थरों से तैयार किए गए तीन स्तूप भी मिले थे. स्तूप में बिना सिर वाली मूर्ति के साथ ही अस्थियां भी मिली थीं. यह मुर्तियां और अस्थियां नागार्जुन की ही हैंअब तक हुए उत्खनन में बोधिसत्व व खड़े भिक्खू और सातवाहनकालीन चिन्ह भी मिले हैं. इस के बारे में माना जा रहा है की टेकड़ी पर तालाब के नीचे उत्खनन करने पर बौद्धकालीन स्तूप मिल सकते हैं मनसर टेकड़ी पर एक समय बौद्धकालीन विश्वविद्यालय था. यहां बौद्धकालीन अवशेष होने के कारण उत्खनन का निवेदन पुरातत्व विभाग को दिया गया था. किन उन्होंने इस पत्र पर ध्यान नहीं दिया.
पुरातत्व विभाग के सेवानिवृत्त अधिकारी ए.के. शर्मा ने और 50 फीट नीचे खुदाई करने पर भगवान बुद्ध की अस्थियां मिलने का अनुमान है उन्होंने बताया कि यह सम्पूर्ण उत्खनन करीब 9 साल तक चला. अंग्रेजों ने 17 नवंबर 1906 को मनसर टेकड़ी राष्ट्रीय स्वरक्षित स्मारक के नाम से घोषित की थी. लेकिन मनसर टेकड़ी पर सातवाहन काल के पहले से ही बौद्ध विश्वविद्यालय था.
नागार्जुन के बारे में जानकारी देते हुए भंते ने बताया कि 500 से 600 वर्ष पहले नागार्जुन का जन्म हुआ था. वे आयुर्वेद व रसायन के जनक थे. उन्होंने ही महायान पंथ की स्थापना की थी
Monday, 28 August 2017
इकान-डो जेनरीन-जी बौद्ध मठ ,क्योटो प्रीफेक्चर,जापान
इकान-डो जेनरीन-जी बौद्ध मठ जापान के क्योटो प्रीफेक्चर में है। इस मठ को बौद्ध भिक्षु कुकाई के एक छात्र शिनशो द्वारा स्थापित किया गया था, और यह मठ पतझड़ के मौसम में अपने गिरते पत्तों के लिए प्रसिद्ध है और साथ ही बौदध धम्म सिखने के एक केंद्र के रूप में भी इस मठ को 853 स्थापित किया गया था
इकान-डो जेनरीन-जी बौद्ध मठ जापान के क्योटो प्रीफेक्चर में है। इस मठ को बौद्ध भिक्षु कुकाई के एक छात्र शिनशो द्वारा स्थापित किया गया था, और यह मठ पतझड़ के मौसम में अपने गिरते पत्तों के लिए प्रसिद्ध है और साथ ही बौदध धम्म सिखने के एक केंद्र के रूप में भी इस मठ को 853 स्थापित किया गया था
Wednesday, 23 August 2017
डाइकाकु -जी ,क्योटो प्रीफेक्चर,जापान
डाइकाकु -जी बौद्ध मठ जापान के क्योटो प्रीफेक्चर में है। इस मठ को हेनिन समय काल में सन् 814 में बनवाया गया था जब यह सम्राट सागा का साम्राज्य था। इस मठ के पीछे एक कहानी है ऐसा कहा जाता है की एक बार जापान में गंभीर महामारी फैली तब बौद्ध धम्म की एक शाखा शिंगोन बौद्ध धम्म के संस्थापक कोबो डाशी में सम्राट सागा को अपने हाथो से बौद्ध धार्मिक दस्तावेज को हृदय सूत्र की एक लिखित प्रतिलिपि बनाने को कहा सम्राट ने ऐसा ही किया और जापान को महामारी से मुक्ति मिल गई आज भी यह लोग आके हृदय सूत्र को अपने हाथो से लिखते है सम्राट की मृत्यु के बाद उन की बेटी ने यह एक भव्य मठ का निर्माण किया।
डाइकाकु -जी बौद्ध मठ जापान के क्योटो प्रीफेक्चर में है। इस मठ को हेनिन समय काल में सन् 814 में बनवाया गया था जब यह सम्राट सागा का साम्राज्य था। इस मठ के पीछे एक कहानी है ऐसा कहा जाता है की एक बार जापान में गंभीर महामारी फैली तब बौद्ध धम्म की एक शाखा शिंगोन बौद्ध धम्म के संस्थापक कोबो डाशी में सम्राट सागा को अपने हाथो से बौद्ध धार्मिक दस्तावेज को हृदय सूत्र की एक लिखित प्रतिलिपि बनाने को कहा सम्राट ने ऐसा ही किया और जापान को महामारी से मुक्ति मिल गई आज भी यह लोग आके हृदय सूत्र को अपने हाथो से लिखते है सम्राट की मृत्यु के बाद उन की बेटी ने यह एक भव्य मठ का निर्माण किया।
Thursday, 17 August 2017
ब्योडो -इन ,क्योटो प्रीफेक्चर,जापान
ब्योडो -इन बौद्ध मठ जापान के क्योटो प्रीफेक्चर की उजी शहर में है। इसे हेनिन समय काल के अंतिम समय में बनाया गया था। 1994 में, यूनेस्को ने इस मठ को विश्व विरासत स्थल के रूप में सूचीबद्ध किया वैसे इस मठ को 998 में मंत्रियो के लिए बनाया गया था इस की सबसे कीमती सम्पति इस का फोनिक्स हाल है जिसे जापान के राष्ट्रीय खजाने का दर्जा प्राप्त है साथ ही इस मठ के गार्डन को राष्ट्रीय ऐतिहासिक स्थल और दर्शनीय सौंदर्य स्थान का दर्जा प्राप्त हैं।
ब्योडो -इन बौद्ध मठ जापान के क्योटो प्रीफेक्चर की उजी शहर में है। इसे हेनिन समय काल के अंतिम समय में बनाया गया था। 1994 में, यूनेस्को ने इस मठ को विश्व विरासत स्थल के रूप में सूचीबद्ध किया वैसे इस मठ को 998 में मंत्रियो के लिए बनाया गया था इस की सबसे कीमती सम्पति इस का फोनिक्स हाल है जिसे जापान के राष्ट्रीय खजाने का दर्जा प्राप्त है साथ ही इस मठ के गार्डन को राष्ट्रीय ऐतिहासिक स्थल और दर्शनीय सौंदर्य स्थान का दर्जा प्राप्त हैं।
Friday, 4 August 2017
एडशिनो नेबुत्सु-जी,क्योटो प्रीफेक्चर,जापान
जापान की धार्मिक नगरी क्योटो में स्थित है एडशिनो नेबुत्सु-जी बौद्ध तीर्थ है ऐसा कहा जाता है 811 कुकाई नाम के बौद्ध भिक्षु ने इस की स्थापना की थी। हेयियन काल में इस स्थल पर मृत शरीरों को छोड़ दिया जाता था जिन की याद में कुछ आठ हजार बौद्ध प्रतिमाएं है जिन्हे यहां देखा जा सकता है। सैटो कूओ नाम का एक समारोह, यह आयोजित किया जाता है तब यहां दस हजार पत्थर के मूर्तियां के पास मोमबत्तियों जलाई जाती है
जापान की धार्मिक नगरी क्योटो में स्थित है एडशिनो नेबुत्सु-जी बौद्ध तीर्थ है ऐसा कहा जाता है 811 कुकाई नाम के बौद्ध भिक्षु ने इस की स्थापना की थी। हेयियन काल में इस स्थल पर मृत शरीरों को छोड़ दिया जाता था जिन की याद में कुछ आठ हजार बौद्ध प्रतिमाएं है जिन्हे यहां देखा जा सकता है। सैटो कूओ नाम का एक समारोह, यह आयोजित किया जाता है तब यहां दस हजार पत्थर के मूर्तियां के पास मोमबत्तियों जलाई जाती है
Saturday, 15 July 2017
सोजी -जी बौद्ध मठ जापान के कानागावा प्रीफेक्चर में स्थित है। इसे 740 में एक शिंगोन बौद्ध मठ के रूप में स्थापित किया गया था इस में कुल 12 इमारते है 1898 में मठ पूरी तरह से आग से नष्ट हो गया था इसे 1911 में वापस बनाया गया यह जापान में सबसे बड़े और व्यस्ततम बौद्ध संस्थानों में से एक है
यहां के बौद्ध भिक्षु की दिनचर्या
20 वीं शताब्दी के मध्य के अनुसार, भिक्षुओं का दिन गर्मियों में 3 बजे शुरू होता है और सर्दियों में एक घंटे बाद में इस के बाद सभी बौद्ध भिक्षु 2 घंटे जाज़ेन नाम की ध्यान विद्या का अभ्यास करते है यह विपश्यना का ही एक रूप है 75 मिनट के लिए सभी बौद्ध ग्रन्थ का पाठ करते है बाद में नाश्ता (चावल दलिया, चाय और अचार) खाते हैं और फिर 90 मिनट के लिए वे इमारतों और बहार साफ़ सफाई करते है 8 बजे वे चीनी कविता और डोन्गेन और केज़न जैसे ज़ेनजियों के लेखन का अध्ययन करते हैं।11 बजे वे ब्यूसूडेन जाते हैं जहां वे आगंतुकों के लिए बौद्ध सूत्रों का पाठ करते है 1 से 3 बजे वे खाना खाते है इस के बाद वे एक बार फिर आगंतुकों के लिए बौद्ध सूत्रों का पाठ करते है और 5 बजे खाना खाते है और 6 से 8 बजे उन के गुरु द्वारा उन्हें बौद्ध सूत्र पढ़ना सिखाया जाता है 8 से 9 बजे तक वे जाज़ेन अभ्यास करने के लिए वापस आते हैं और 9 बजे सो जाते है
Tuesday, 11 July 2017
कोटकु-इन बौद्ध मठ, कानागावा प्रीफेक्चर,जापान
कोटकु-इन बौद्ध मठ जापान के कानागावा प्रीफेक्चर में स्थित है। यह मठ "महान बुद्ध" के लिए प्रसिद्ध है,जो मठ के बहार बुद्ध की एक विशाल कांस्य प्रतिमा है जो जापान के सबसे प्रसिद्ध प्रतीकों में से एक है।प्रतिमा लगभग 13.35 मीटर (43.8 फीट) लम्बी है जिसमें आधार शामिल है और इसका वज़न 93 टन है।
कोटकु-इन बौद्ध मठ जापान के कानागावा प्रीफेक्चर में स्थित है। यह मठ "महान बुद्ध" के लिए प्रसिद्ध है,जो मठ के बहार बुद्ध की एक विशाल कांस्य प्रतिमा है जो जापान के सबसे प्रसिद्ध प्रतीकों में से एक है।प्रतिमा लगभग 13.35 मीटर (43.8 फीट) लम्बी है जिसमें आधार शामिल है और इसका वज़न 93 टन है।
केंचो -जी बौद्ध मठ, कानागावा प्रीफेक्चर,जापान
केंचो -जी बौद्ध मठ जापान के कानागावा प्रीफेक्चर में स्थित है,केंचो जी जापान में सबसे पुराना बौद्ध धम्म की ज़ेन शाखा का प्रशिक्षण मठ है और कामकुरा पांच-पर्वत प्रणाली में सर्वोच्च रैंक रखती है।
पांच-पर्वत प्रणाली की शुरवात भारत में हुयी थी इस के अंदर मठ को किसी निर्जन स्थान पर बनाया जाता है भारत से ही यह चीन और जापान पंहुचा । यह मठ सम्राट गो-फुकुसा के आदेश पर बनाया गया था जिस का काम 1253 में पूरा किया गया था।
केंचो -जी बौद्ध मठ जापान के कानागावा प्रीफेक्चर में स्थित है,केंचो जी जापान में सबसे पुराना बौद्ध धम्म की ज़ेन शाखा का प्रशिक्षण मठ है और कामकुरा पांच-पर्वत प्रणाली में सर्वोच्च रैंक रखती है।
पांच-पर्वत प्रणाली की शुरवात भारत में हुयी थी इस के अंदर मठ को किसी निर्जन स्थान पर बनाया जाता है भारत से ही यह चीन और जापान पंहुचा । यह मठ सम्राट गो-फुकुसा के आदेश पर बनाया गया था जिस का काम 1253 में पूरा किया गया था।
इनगाकु -जी बौद्ध मठ, कानागावा प्रीफेक्चर,जापान
इनगाकु -जी बौद्ध मठ जापान के कानागावा प्रीफेक्चर में स्थित है। इनगाकु -जी बौद्ध मठ 1282 में एक चीनी जेन बौद्ध भिक्षु द्वारा जापान के तत्कालीन शासक होजो टोकिमुने के अनुरोध पर
स्थापित किया गया था जिन्होंने 1274 से 1281 की अवधि में एक मंगोल आक्रमण को रोका था। इस बौद्ध मठ को दोनों पक्षों के जो लोग जो युद्ध में मारे गए थे उन की याद में बनाया गया था साथ ही बौद्ध धम्म जी जेन शाखा का प्रचार भी इस मठ को स्थापित करने का मकसद था।
इनगाकु -जी बौद्ध मठ जापान के कानागावा प्रीफेक्चर में स्थित है। इनगाकु -जी बौद्ध मठ 1282 में एक चीनी जेन बौद्ध भिक्षु द्वारा जापान के तत्कालीन शासक होजो टोकिमुने के अनुरोध पर
स्थापित किया गया था जिन्होंने 1274 से 1281 की अवधि में एक मंगोल आक्रमण को रोका था। इस बौद्ध मठ को दोनों पक्षों के जो लोग जो युद्ध में मारे गए थे उन की याद में बनाया गया था साथ ही बौद्ध धम्म जी जेन शाखा का प्रचार भी इस मठ को स्थापित करने का मकसद था।
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